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महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा विधि: निशीथ काल मुहूर्त, रुद्राभिषेक एवं अभिषेक नियम

By Dharma Jyothi Vedika Editorial Board •

संक्षेप में: चार प्रहर शिव पूजा की मुख्य बातें

महाशिवरात्रि की रात्रि को चार बराबर प्रहरों में बांटकर भगवान शिव का चार अलग-अलग द्रव्यों से रुद्राभिषेक किया जाता है।

चारों प्रहर के द्रव्य: प्रथम प्रहर में दूध, द्वितीय प्रहर में दही, तृतीय प्रहर में देसी घी और चतुर्थ प्रहर में शहद व गन्ने का रस। रात के मध्य का समय (निशीथ काल) शिव आराधना का परम फलदायी क्षण होता है।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ने वाली महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन की पावन रात्रि है। शिवपुराण के अनुसार जो भक्त रात्रि जागरण कर चारों प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक और पूजन करते हैं, उनके समस्त संचित पापों का क्षय होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

चार प्रहर पूजा समय और अभिषेक द्रव्य

सूर्यास्त से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक की रात्रि को चार भागों में विभाजित किया जाता है:

प्रहर समय (अनुमानित) मुख्य अभिषेक द्रव्य विशिष्ट मंत्र व फल
प्रथम प्रहर शाम 06:15 से रात्रि 09:20 कच्चा गाय का दूध ईशान रूप का ध्यान, आरोग्य व शांति
द्वितीय प्रहर रात्रि 09:20 से मध्यरात्रि 12:30 शुद्ध गाय का दही अघोर रूप का ध्यान, संतान व सुख
तृतीय प्रहर (निशीथ काल) मध्यरात्रि 12:30 से प्रातः 03:40 गाय का देसी घी वामदेव रूप, अकाल मृत्यु निवारण व ज्ञान
चतुर्थ प्रहर प्रातः 03:40 से सूर्योदय तक शहद एवं गन्ने का रस सद्योजात रूप, मोक्ष व धन-समृद्धि
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आज का निशीथ काल मुहूर्त देखें

सूर्योदय और सूर्यास्त के आधार पर सटीक निशीथ काल गणना हमारे पंचांग में देखें।

दैनिक पंचांग देखें →

बिल्वपत्र और पूजा सामग्री के शास्त्रीय नियम

  1. अखंड बिल्वपत्र: शिवलिंग पर केवल वही बेलपत्र चढ़ाएं जो तीन पत्तियों से युक्त, बिना छेद और बिना कटा-फटा हो। बेलपत्र का चिकना भाग शिवलिंग की ओर होना चाहिए।
  2. भस्म एवं चंदन: भगवान शिव को श्वेत भस्म और सफेद चंदन का त्रिपुंड अर्पित करें। कभी भी शिवलिंग पर सिंदूर, रोली या हल्दी न चढ़ाएं।
  3. वर्जित फूल: केतकी और केवड़े के फूल भगवान शिव की पूजा में पूर्णतः वर्जित हैं। धतूरा, मदार (आक) और शमी के पत्ते विशेष रूप से प्रिय हैं।
  4. अर्घा की परिक्रमा: शिवलिंग की संपूर्ण परिक्रमा कभी नहीं की जाती। केवल आधी परिक्रमा (सोमसूत्र का उल्लंघन किए बिना चंद्राकार परिक्रमा) करने का विधान है।

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