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विवाह मुहूर्त 2027: शुभ लग्न तिथियां, गुरु-शुक्र तारा अस्त एवं चातुर्मास निषेध काल

By Dharma Jyothi Vedika Editorial Board •


✦ त्वरित जानकारी: साल 2027 में विवाह (शादी) के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त एवं वर्जित काल

वर्ष 2027 में विवाह के तीन मुख्य शुभ कालखंड हैं: शीतकालीन सत्र (17 जनवरी से 26 फरवरी), ग्रीष्मकालीन सत्र (18 अप्रैल से 24 जून), और देवउठनी एकादशी उपरांत शीतकालीन सत्र (19 नवंबर से 10 दिसंबर)। 9 मई 2027 को अक्षय तृतीया अबूझ मुहूर्त रहेगी।

अति महत्वपूर्ण वर्जित अवधियां: चातुर्मास (14 जुलाई से 10 नवंबर 2027) में श्रीहरि के योगनिद्रा में होने के कारण, शुक्र तारा अस्त (6 जुलाई से 13 अगस्त 2027), मीन खरमास (15 मार्च से 14 अप्रैल), और होलाष्टक (14 से 22 मार्च 2027) में सभी प्रकार के विवाह संस्कार पूर्णतः वर्जित हैं।

सनातनी हिंदू परंपरा में विवाह (विवाह संस्कार) केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि दो आत्माओं और दो कुलों का पवित्र वैदिक गठबंधन है। मुहूर्त चिंतामणि, बृहत्संहिता और नारद संहिता के अनुसार जब वर और वधू के लिए गुरु-सूर्य बल, चंद्र शुद्धि और शुद्ध लग्न का मिलान होता है, तभी दांपत्य जीवन में सुख, शांति, दीर्घायु और उत्तम संतान का वरदान प्राप्त होता है।

विवाह लग्न शुद्धि के मूल वैदिक सिद्धांत

  • 1. कन्या के लिए गुरु बल: ज्योतिष में बृहस्पति (गुरु) पति, सौभाग्य और संतान के कारक हैं। कन्या की जन्म राशि से गुरु का 2, 5, 7, 9 या 11वें भाव में गोचर होना अनिवार्य माना जाता है।
  • 2. वर के लिए सूर्य बल: वर की जन्म राशि से सूर्य का 3, 6, 10 या 11वें भाव में होना अति शुभ फलदायी है, जो वर को ओज, स्वास्थ्य और कर्मनिष्ठा प्रदान करता है।
  • 3. दोनों के लिए चंद्र बल: विवाह के दिन चंद्रमा वर-वधू दोनों की राशि से 6, 8 या 12वें भाव में नहीं होना चाहिए। विशेष रूप से ‘अष्टम चंद्र’ दोष सर्वथा त्याज्य है।
  • 4. सप्तम भाव शुद्धि: विवाह लग्न कुंडली के सातवें भाव (दांपत्य भाव) में कोई पापी ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य) नहीं होना चाहिए। इसे ‘सप्तम शुद्धि’ कहा जाता है।

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2027 में विवाह के लिए वर्जित समय (तथ्य जांच)

वर्जित अवधि 2027 की सटीक तिथियां धार्मिक कारण
चातुर्मास 2027 14 जुलाई 2027 से 10 नवंबर 2027 तक देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इस समय मांगलिक संस्कार नहीं होते।
शुक्र अस्त (तारा डूबना) 6 जुलाई 2027 से 13 अगस्त 2027 तक दांपत्य सुख के कारक शुक्र ग्रह अस्त रहने पर विवाह संस्कार शास्त्रों में सर्वथा त्याज्य है।
मीन खरमास (मलमास) 15 मार्च 2027 से 14 अप्रैल 2027 तक सूर्य का मीन राशि में वास होने से खरमास लगता है, जिसमें शुभ विवाह कार्य वर्जित होते हैं।
होलाष्टक 2027 14 मार्च 2027 से 22 मार्च 2027 तक होली से 8 दिन पूर्व ग्रहों का उग्र स्वभाव रहता है। उत्तर भारत में विवाह पूर्णतः निषेध है।
श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) 16 सितंबर 2027 से 30 सितंबर 2027 तक पितरों के तर्पण की अवधि; उत्सव व फेरे वर्जित हैं।
धनु खरमास 16 दिसंबर 2027 से 14 जनवरी 2028 तक सूर्य का धनु संक्रांति प्रवास। विवाह के शहनाई सुर थम जाते हैं।

माहवार विवाह शुभ मुहूर्त 2027 तालिका

माह (2027) शुभ विवाह तिथियां श्रेष्ठ नक्षत्र शुभ लग्न विशेष विवरण
जनवरी 17, 18, 23, 24, 29, 30 जनवरी रोहिणी, मृगशिरा, स्वाति वृषभ, मिथुन, कन्या मकर संक्रांति (14 जनवरी) के बाद विवाह प्रारंभ।
फरवरी (माघ) 5, 6, 11, 12, 18, 19, 25, 26 फरवरी मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, अनुराधा मिथुन, सिंह, तुला माघ मास में वसंत पंचमी का स्वतः सिद्ध योग।
मार्च कोई मुहूर्त नहीं (होलाष्टक एवं मीन खरमास)।
अप्रैल (वैशाख) 18, 19, 23, 24, 28, 29, 30 अप्रैल हस्त, स्वाति, अनुराधा, रेवती कन्या, तुला, धनु मेष संक्रांति के बाद लग्न आरंभ।
मई (अक्षय तृतीया माह) 6, 7, 9 (अक्षय तृतीया), 14, 15, 20, 21, 27, 28 मई रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराफाल्गुनी, अनुराधा वृषभ, मिथुन, सिंह वर्ष का सबसे बड़ा शादी सीजन। 9 मई को अबूझ मुहूर्त।
जून (ज्येष्ठ) 3, 4, 10, 11, 17, 18, 24 जून स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा सिंह, कन्या, कुंभ चातुर्मास आरंभ होने से पूर्व अंतिम अवसर।
जुलाई – अक्टूबर कोई मुहूर्त नहीं (चातुर्मास एवं शुक्र तारा अस्त)।
नवंबर (कार्तिक) 19, 20, 21, 25, 26, 27 नवंबर उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी धनु, कुंभ, मीन देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह के बाद विवाहों का शुभारंभ।
दिसंबर (मार्गशीर्ष) 2, 3, 4, 8, 9, 10 दिसंबर मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य वृषभ, मिथुन धनु खरमास (16 दिसंबर) से पूर्व शीतकालीन मुहूर्त।

वैदिक विवाह के पावन संस्कार

  1. कन्यादान व हस्तमिलाप: पिता द्वारा कन्या का हाथ वर के हाथ में सौंपना और विष्णु रूप वर की पूजा करना।
  2. हवन व लाजा होम: पवित्र अग्नि के समक्ष घी और धान की खीलें (लाजा) अर्पित कर अग्निदेव को साक्षी बनाना।
  3. सप्तपदी (सात फेरे): अग्नि के चारों ओर सात कदम चलकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सुख-दुख और सात जन्मों के निबाह के सात वचन लेना।
  4. सिंदूरदान व मंगलसूत्र: वर द्वारा वधू की मांग में सिंदूर भरना और मंगलसूत्र धारण कराना, जो सुहाग का अमर प्रतीक है।
  5. ध्रुव व अरुंधती दर्शन: आकाश में ध्रुव तारे की स्थिरता और वशिष्ठ-अरुंधती के परस्पर प्रेम का आशीर्वाद लेना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: शुक्र अस्त (तारा डूबने) में शादी क्यों नहीं होती?

शुक्र ग्रह को भौतिक सुख, दांपत्य प्रेम और वैवाहिक सामंजस्य का अधिष्ठाता माना गया है। जब शुक्र सूर्य के अत्यंत निकट आकर अस्त हो जाता है, तो विवाह का शुभ प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। अतः शुक्र अस्त में फेरे नहीं लिए जाते।

प्रश्न 2: क्या अक्षय तृतीया पर बिना कुंडली मिलाए विवाह हो सकता है?

अक्षय तृतीया (9 मई 2027) एक स्वतः सिद्ध अबूझ मुहूर्त है, जिसमें मुहूर्त शोधन की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी वर-वधू के गुण मिलान और नाड़ी दोष निवारण हेतु विद्वान ज्योतिषी का परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

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